Sunday, 29 August 2010
दूर का सपना
" थोड़ी दूर का सपना.... पास आया... तो उसका चेहरा बदला- बदला सा था.
मतलब कुछ ख़ास नहीं और बुरा भी नहीं.
मैंने उस से पुछा कि तुमको कही देखा है... शकल जानी पहचानी से है.
तो वह बोला सर दूर से पिम्पल नहीं दिखते है.....
लेकिन मुझे यकीन करना मुश्किल हो रहा था की यह वही है....
मैं बोला की तुम बुरा मत मन ना.....तुम सब सपने केवल दूर से ही अच्छे लगते हो
पास आते ही इतने बदसूरत क्यों...?
तो वह बोला की आप लोगो के कारण.......
मैंने पुछा....क्यों ?
वोह बोला आप लोग पावडर लाली लगा देते हो... और निहारते रहते हो
बोलते हो यहाँ बैठो, वहा जाओ, हँसके दिखाओ, मतलब कटपुतली....
मगर जब आपके पास धीरे धीरे आता हूँ तो मेरा सारा पावडर लाली पसीने मैं उतर जाता है...
अब मैं जो हूँ आपके सामने हूँ.
वैसे मैं बता दू की यह पिम्पल आपकी बिगड़ी हुई दिनचर्या से आये है....
अगर आपकी दिनचर्या सही रहती तो मैं भी स्वस्थ सुन्दर होता.....
मैंने सोचा की क्या यह सच बोल रहा है...यह बात हजम करने मैं दिक्कत हो रही है
...मतलब मुझे "एसिडिटी" की प्रोब्लम है....
इतने मैं वह बोला की अब क्या करना है ?...अब तो मैं तुम्हारे ही साथ रहने वाला हूँ...
मैंने पुछा क्यों ?
वोह बोला तुमने इतना सारा समय लगाया मुझ से मिलने मैं...तुम्हारे कर्मो का फल हूँ...इसे चाह के न चाह के खाना ही पड़ेगा..
.मैंने लम्बी सांस लेकर पुछा की क्या अब कुछ नहीं हो सकता.
वोह बोला...हा हो सकता है...
मैंने पुछा की क्या ?
वोह बोला अब तुम मुझे चाहो कूड़ेदान मैं डाल दो...मैं वहां बदबू फैलता रहूँगा...
और अगर चाहो तो बढ़िया फ्रूट सलाद बना कर कांच की प्लेट मैं फोक्क से खाओ...
हा इतना आश्वासन देता हूँ की मुझे खाने के बाद तुमको कभी भी
एसिडिटी नहीं होगी.......
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